स्वप्न मेरे

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

संस्कृती धर्म विरासत मेरे गोपाल की है…

मेरी हर एक ज़रूरत मेरे गोपाल की है,
गिन के हर एक मुसीबत मेरे गोपाल की है.

झूलती अलकें अधर मन्द नयन कजरारे,
नील-वर्णी सी ये रंगत मेरे गोपाल की है.

पीत वस्त्रों पे मुकुट मोर सजे हैं सर पर,
ऐसी मन-मोहिनी सूरत मेरे गोपाल की है.

कालिया नाग पे नर्तन भी किया है उसने,
कुछ भी कर लेने की कुव्वत मेरे गोपाल की है.

जन्म का मृत्यु-पुनर्जन्म का लेखा-जोखा,
पाप और पुण्य हकीकत मेरे गोपाल की है.

गोपियों संग रचें रास भुला कर सुध-बुध,
प्रेम की ऐसी रवायत मेरे गोपाल की है.

द्वारका-धीश ही इस जग के सकल हैं स्वामी,
और मुझपे भी इनायत मेरे गोपाल की है.

तन, गगन वायु से पृथ्वी से अगन जल से बना,
रूह लेकिन ये अमानत मेरे गोपाल की है.

अब ये मन ज्ञान की बातों में नहीं है लगता,
अब तो मन को जो लगी लत मेरे गोपाल की है.

जो दिया उस ने दिया जो भी लिया उस से लिया,
मेरी साँसों पे हकूमत मेरे गोपाल की है.

इस भरत-खण्ड के कण-कण में बसी है गीता,
संस्कृती धर्म विरासत मेरे गोपाल की है.

रविवार, 30 अगस्त 2026

दर्द भरे लम्हों को क्या पुस्तक करती हो …

चौबिस-घंटे चैटिंग तो बेशक करती हो,
इश्क़-विश्क़ करती हो या नाटक करती हो.

कुछ पल तुम जब रोक नहीं सकती हो मुख पर,
झूठ-मूठ का ग़ुस्सा क्यों नाहक करती हो.

गुपचुप निकलोगी घर से तो क्या जाएगा,
हील पहन कर बस जब-तब ठक-ठक करती हो.

इश्क़ है तुमसे, इश्क़ है तुमसे, क़सम तुम्हारी,
बात बात पे काहे इतना शक करती हो.

सच बोलो सोती भी हो या धड़कन बन के,
दिल में मेरे पल-पल बस धक-धक करती हो.

जैसी भी है मुझको तो अच्छी लगती है,
मौके-बे-मौके जो ये बक-बक करती हो.

धूप-छाँव, सुख-दुख की, शिकन नहीं चेहरे पर,
दर्द भरे लम्हों को क्या पुस्तक करती हो.

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

तेरी यादों से ओझल हो गया तो …

इसे पी कर मुक़म्मल हो गया तो,
में प्यासी रूह, तू जल हो गया तो.

बहाते हो जो भर-भर अश्क़ छुप कर,
ये रेगिस्तान जंगल हो गया तो.

रहेगा काम क्या लोगों पे बाक़ी,
धरम का मस’अला हल हो गया तो.

मुहब्बत में न इतने दंश देना,
कहीं ये ज़िस्म संदल हो गया तो.

मुझे तुम ओढ़ लेना सर्दियों में,
तेरी उल्फ़त में कम्बल हो गया तो.

समुंदर हो, तेरी छत, खेत चाहे,
बरस लूँगा जो बादल हो गया तो.

इसे जी लो अभी इस वक्त, है ये,
न होगा आज, पल-कल हो गया तो.

सफ़र मुश्किल न हो फिर ज़िन्दगी का,
तेरी यादों से ओझल हो गया तो.

शनिवार, 8 अगस्त 2026

मगर मुश्किल है राँझे-हीर का किरदार हो जाना ...

मुझे अच्छा लगेगा आपका सरकार हो जाना,
ये गलती है, तो इस गलती, का सौ-सौ बार हो जाना.

छपक छप-छप लहर के साथ सागर पार हो जाना,
इसे कहते हैं उनसे प्यार का इज़हार हो जाना.

न पूछो दिल पे कब क्या क्या शरीफ़ों के गुज़रती है,
दबे से राज़ का यूँ एक दिन अख़बार हो जाना.

हसीनों की अदा में ख़ासियत ये आम होती है,
लगे दिल झूमने तो यक-ब-यक इनकार हो जाना.

चहक उठता था हर बचपन, महक उठता था हर यौवन,
खटकता है बुजुर्गों का वहाँ दीवार हो जाना.

खिलें गुल, चूम ले तितली, गुज़र जाएँ वो इठला कर,
यही है हाँ, यही है हाँ, किसी से प्यार हो जाना.

सज़ा इस ज़िन्दगी में क्या कोई इस से बड़ी होगी,
जिसे हो भूलना उस बेवफ़ा से प्यार हो जाना.

में अपनों से तुम अपनों से लड़ो मिलना है तब मुमकिन,
मगर मुश्किल है राँझे-हीर का किरदार हो जाना.

शनिवार, 1 अगस्त 2026

रहना नहीं इधर न रहो पर उधर नहीं ...

उड़ लेंगे आसमान में इसकी फ़िकर नहीं,
तकलीफ़ है हमें के परिंदों के पर नहीं,

तुम हो मेरे क़रीब ज़माने का डर नही,
दुख, दर्द, धूप, छाँव का हम पर असर नहीं,

आँखों में आंसुओं का जो सैलाब है जमा,
लोगों पे आज़माना इन्हें मेरे पर नहीं,

महसूस कर सकोगे जो बैठोगे आस-पास,
शबनम की बूँद हूँ मैं दहकता शरर नहीं,

है राह शबनमी तो मैं रिश्ते भी तोड़ दूँ,
माना के हमको इश्क़ है पर इस क़दर नहीं,

इस रास्ते से हो के गुज़रते भी किस तरह,
इस रास्ते में छाँव का कोई शजर नहीं,

ये राह इसलिए भी महकती है अब तलक,
तितली परिंदे ढेर हैं लेकिन बशर नहीं,

माना वे तेरे ख़ास हैं, पर हम भी कुछ तो हैं,
रहना नहीं इधर न रहो पर उधर नहीं,