स्वप्न मेरे

सोमवार, 29 जून 2026

दिल में छुपा है इश्क़ जो कैसे बताओगे ...

तुम धूप का लिबास पहन कर जो आओगे.
मुमकिन है तीरग़ी से कभी मिल न पाओगे.

कश-कश के साथ तुमको भी पी लूँगा सोच लो,
हमको जो एक बार भी सिगरेट पिलाओगे.

आसान आसमान पे उनको है टाँकना,
पर ये बताओ चाँद को कब तक हटाओगे.

पूरा करो के तोड़ दो कोशिश तो पर करो,
वादा किया है खुद से तो कब तक निभाओगे.

उतरो के दो-दो हाथ समुंदर से भी करो,
चप्पू बताओ रेत में कब तक चलाओगे.

इज़हार अपना इश्क़ न करने में देर हो,
दिन-रात उनकी याद में वरना बिताओगे.

पहचानी रह-गुजर पे भी मंज़िल का है पता,
सम्मान होगा राह जो अपनी बनाओगे.

नाक़ामियों से उलझे रहोगे जो देर तक,
तुम क़द को कैसे अपने शिखर तक उठाओगे.

खुल कर तो बात बोलना अब तक न आ सका,
दिल में छुपा है इश्क़ जो कैसे बताओगे.

बुधवार, 24 जून 2026

कैसे कहेंगे उसको वो बे-रोज़गार है …

दीवार है जो बीच की उसमें दरार है.
कंधों पे अब इस छत का भी दारोमदार है.

किस बात का बताओ तुम्हें इंतज़ार है.
अब हो गया तो बोल भी दो हमसे प्यार है.

जिसकी नहीं कलम से कभी दोस्ती हुई,
कहते हैं वो भी एक उपन्यासकार है.

क़ानून सिर्फ़ एक है क़ानून कुछ नहीं,
जंगल का फिर भी हाल मगर शानदार है.

पैसा अगर हो पास तो जितनी बुराई हो,
बच्चा रईस बाप का भी होनहार है.

सच है के उसके दिल को नहीं जान पाएगा,
माना तमाम ग्रंथों का वो जानकार है.

मोहलत मिली न इश्क़ से आठों पहर जिसे,
कैसे कहेंगे उसको वो बे-रोज़गार है.

गुरुवार, 18 जून 2026

कह-कहे फ़्री में तोल देता है …

पोल ऐसे ही खोल देता है.
वो कहीं कुछ भी बोल देता है.

सोच लो कम-से-कम है क्या क़ीमत,
वो तो कोड़ी का मोल देता है.

टू-द-पॉइंट जवाब दूँ कैसे,
प्रश्न जब गोल-गोल देता है.

कौन सी चैट है ख़ुदा जाने,
लोल के बदले लोल देता है.

वो मदारी है विष फ़िज़ाओं में,
लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ घोल देता है.

वो प्रजातंत्र का है निर्देशक,
चुप ही रहने का रोल देता है.

है तो मुश्किल मगर वो दुख ले कर,
कह-कहे फ्री में तोल देता है.

शनिवार, 6 जून 2026

छज्जे में फिर मिले हैं कबूतर लहुलुहान ...

हम क्यों हुए हैं इश्क़ में गिर कर लहुलुहान.
अब तक हुवे नहीं जो सितमगर लहुलुहान.

कुछ प्रश्न, प्रश्न तक ही रहे तब ही ठीक है,
कर देंगें वर्ना उनके ये उत्तर लहुलुहान.

यादों के तिनके पैर में कुछ इस क़दर गढ़े,
जूतों के बीच पाँव हैं दिन भर लहुलुहान.

एहसास दो-पहर का है सुबहा के नो बजे,
गर्मी में आफ़ताब है अक्सर लहुलुहान.

कुछ यूँ शबे फिराक़ में आहें दहक उठीं,
तकिया, रज़ाई, सिलवटें, बिस्तर, लहुलुहान.

रुखसत हो आफ़ताब, के आमद हो चाँद की,
हर शाम ही हुआ है समुन्दर लहुलुहान.

ज़ुल्मों सितम की हद को न पूछो तो ठीक है,
छज्जे में फिर मिले हैं कबूतर लहुलुहान.

शनिवार, 30 मई 2026

इंसानों में इंसान तो पाया नहीं जाता ...

पल पहली मुहब्बत का भुलाया नहीं जाता.
ख़त यूँ ही दराज़ों में छुपाया नहीं जाता.

जंगल में कई मेमने यह पूछ रहे हैं,
क्यों घास कभी शेर से खाया नहीं जाता.

मुमकिन है मुझे भेजा हो पैग़ाम किसी न,
बे-बात कबूतर यूँ उड़ाया नहीं जाता.

पाना है जो छुटकारा ज़रूरी हैं अंधेरे,
इस धूप में तो जिस्म से साया नहीं जाता.

उगते हैं जो गमलों में सभी पूछ रहे हैं,
क्यों गमले में जामुन को लगाया नहीं जाता.

माना के डिनर बुक है मगर छोड़ के उनको,
यूँ चाँद की टैरस पे तो जाया नहीं जाता.

आ चल के कहीं ढूँढ लें पशुओं में मिले तो,
इंसानों में इंसान तो पाया नहीं जाता.